Shri Tungnath Temple Pach kedar RudraPrayag Uttarakhand
इस मंदिर में बड़े विधि -विधान से होती है भगवान भोलेनाथ की भुजाओं की पूजा -अर्चना।
Shri Tungnath Temple Pach kedar RudraPrayag Uttarakhand : उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले के रूद्रप्रयाग शहर से लगभग 70 किलोमीटर दूर दुनिया का सबसे ऊँचाई पर स्थित शिव मंदिर है तुंगनाथ मंदिर । तुंगनाथ का अर्थ है “शिखरों या चोटियों के स्वामी”। तुंगनाथ मंदिर तुंगनाथ पर्वत शिखर पर स्थित है। बाबा तुंगनाथजी को पंच केदारों (केदारनाथ , तुंगनाथ , रुद्रनाथ , मध्यमहेश्वर और कल्पेश्वर) में से तृतीय केदार माना जाता है। ये पंच केदारों में तीसरा केदार मंदिर होने के साथ -साथ सबसे अधिक ऊँचाई पर भी स्थित है। समुंद्रतल से लगभग 3,690 मीटर (12,073 फिट) की ऊँचाई पर स्थित इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ की भुजाओं की पूजा -अर्चना बड़े विधि -विधान से की जाती है। यह मंदिर चंद्रशिला शिखर के ठीक नीचे स्थित है। उच्च हिमालयी क्षेत्र होने के कारण सर्दियों में यह पूरा क्षेत्र बर्फ से ढक जाता है। इसीलिए नवंबर माह में दीपावली के बाद तुंगनाथ मंदिर के कपाट विधिवत पूजा -अर्चना के बाद लगभग छः महीने के लिए बंद कर दिये जाते हैं और बाबा तुंगनाथजी को डोली में बैठाकर एक विशाल धार्मिक उत्सव के साथ बड़े धूमधाम से उखीमठ के पास स्थित मक्कूमठ के मार्कंडेश्वर मंदिर में लाया जाता है जहाँ वो अगले छः माह तक विराजमान रहते हैं। तुंगनाथ मंदिर परिसर का वातावरण एकदम शांत , सुरम्य है। यहाँ से आस -पास के क्षेत्र का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
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कौन हैं पंचकेदार ?
महाभारत युद्ध के बाद गोत्र हत्या (गोत्र यानि अपने ही वंश के लोग) के पाप से मुक्त होने के लिए पांडवों ने भगवान भोलेनाथ की कठोर तपस्या की लेकिन भोलेनाथ ने उन्हें दर्शन नही दिये क्योंकि वो उनसे काफी नाराज थे। इसीलिए वो बैल का रूप धारण कर हिमालय चले गये। लेकिन हिमालय में विचरण करते वक्त भीम ने उन्हें पहचान लिया। भीम ने उन्हें पकड़ना चाहा लेकिन बैल रूपी शिव तुरंत जमीन में समा गये। बाद में भगवान भोलेनाथ के शरीर के अंग पांच जगहों में प्रकट हुए जिन्हें आज “पंच केदार” कहा जाता है। केदारनाथ धाम जिसे प्रथम केदार माना जाता है। वहाँ बैल का पृष्ठ भाग प्रकट हुआ। इसीलिए वहाँ उनके पृष्ठ भाग (कूबड़) की पूजा की जाती है। तुंगनाथ में बाबाजी की भुजाओं की पूजा की जाती है , रुद्रनाथ में बाबा के मुख की पूजा की जाती है , मध्यमहेश्वर में बाबा की नाभि प्रकट हुई थी और कल्पेश्वर में बाबा की जटाओं की पूजा होती है। यानि गढ़वाल हिमालय में बाबा भोलेनाथ के पांच अंगों की पूजा पांच अलग -अलग रूपों में होती है जिन्हें पंच केदार कहते हैं। ये सभी मंदिर बेहद पवित्र व प्राचीन हैं।
कब बंद होते हैं तुंगनाथ मंदिर के कपाट ।
सर्दियों के शुरू होते ही तुंगनाथ मंदिर में अत्यधिक ठण्ड व बर्फवारी होती है जिस वजह से नवंबर माह में दीपावली के बाद विशेष पूजा -अर्चना करके मंदिर के कपाट लगभग छः महीने के लिए बंद कर दिये जाते हैं और फिर गर्मियों में अक्षय तृतीया (अप्रैल -मई) के दिन तुंगनाथ मंदिर के कपाट को पुन: बड़े धूमधाम के साथ खोला जाता है ।
मक्कूमठ का मार्कंडेश्वर मंदिर है बाबा तुंगनाथजी का शीतकालीन निवास ।
हर साल सर्दियों के शुरू होते ही मक्कूमठ में बाबा केदारनाथजी के आगमन का इंतजार सभी लोगों को रहता है। सर्दियों में (नवंबर माह में) दीपावली के बाद तुंगनाथ मंदिर के कपाट लगभग छः महीने के लिए बंद हो जाते हैं और बाबा तुंगनाथ (तुंगनाथ बाबा की उत्सव मूर्ति) को डोली में बैठाकर बड़े धूमधाम से मक्कूमठ (मार्कंडेश्वर मंदिर) लाया जाता है जहाँ वो अगले छः माह तक विराजमान रहते हैं। मक्कूमठ को बाबा तुंगनाथजी की “शीतकालीन गद्दी (Winter Seat)” भी कहा जाता है। मार्कंडेश्वर मंदिर की खास बात यह है कि इस मंदिर के मुख्य पुजारी स्थानीय मैथानी ब्राह्मण है जबकि अन्य केदार मंदिरों के ब्राह्मण रावल होते हैं जो दक्षिण भारत से आते हैं।
अद्भुत व अति प्राचीन है तुंगनाथ मंदिर ।
बाबा तुंगनाथजी को पंच केदारों में से तृतीय केदार माना जाता है । इसीलिए ये मंदिर सभी पंच केदारों में तीसरा मंदिर है। इसके साथ – साथ यह मंदिर समुंद्रतल से लगभग 3,690 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यानि ये मंदिर सभी केदार मंदिरों में सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित है जहाँ से मन्दाकिनी और अलकनंदा घाटियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है । मंदिर अद्भुत , प्राचीन व भव्य है जो मुख्यतः पत्थर व लकड़ी से बना है। यहां शालिग्राम पत्थर से बना भव्य शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के मुख्य द्वार पर नंदी विराजमान हैं। मंदिर के अंदर काल भैरव के अलावा कई और मूर्तियों भी स्थापित हैं जो अष्ट धातु से बनी हैं। तुंगनाथ मंदिर के दाए तरफ गणेशजी एक छोटे से मंदिर में विराजमान हैं। इसके अलावा भी यहाँ और पांच छोटे – छोटे मंदिर हैं।
क्या करें ?
बाबा तुंगनाथजी के दर्शन कीजिए और उनका आशीर्वाद लीजिए। मन्दिर परिसर में शांति से बैठकर यहां की आध्यात्मिक ऊर्जा को महसूस कीजिए। आस -पास के प्राकृतिक सौंदर्य को निहारिये। यहां से लगभग 2 किलोमीटर ऊपर स्थित चंद्रशिला पर्वत पर जा सकते हैं। सुंदर बुग्यालों , बुरांश के फूलों , पर्वतारोहण , ट्रैकिंग और कैंपिंग का मजा लीजिए। खूब फोटोग्राफी कीजिए । इसके अलावा भी रूद्रप्रयाग शहर के आस -पास कई धूमने लायक सुंदर जगहें है जैसे माँ धारीदेवी मंदिर , केदारनाथ , आदि-बद्री , बासुकीताल , अगस्तमुनि मंदिर , खूबसूरत चोपता आदि जहाँ आप जा सकते हैं। आने से पहले अपना Hotel Book अवश्य कर लीजिए।
तुंगनाथ मंदिर आने का सही समय (Best Time To Visit In Tungnath Temple)
सर्दियों के शुरू होते ही तुंगनाथ मंदिर में ठण्ड व बर्फवारी होती है जिस वजह से नवंबर माह में दीपावली के बाद विशेष पूजा -अर्चना कर मंदिर के कपाट लगभग छः महीने के लिए बंद कर दिये जाते हैं। इसीलिए आपको बाबा तुंगनाथजी के दर्शन तुंगनाथ मंदिर में ही करने के लिए गर्मियों (अप्रेल से नवंबर के बीच) में आना पड़ेगा। लेकिन जाड़ों में आप बाबा तुंगनाथजी के दर्शन मक्कूमठ (मार्कंडेश्वर मंदिर) में कर सकते हैं। अगर आप रूद्रप्रयाग में एक – दो दिन रुकना चाहते हैं तो आने से पहले कोई Hotel Book अवश्य कर लीजिए।
ध्यान रखने योग्य बातें।
तुंगनाथ मंदिर के कपाट सर्दियों में बंद हो जाते हैं। इसीलिए मंदिर आने से पहले मंदिर के कपाट खुलने व बंद होने की पूरी जानकारी अवश्य ले लीजिए। अगर आप यहाँ ट्रैकिंग करना चाहते हैं तो पूरी तैयारी के साथ आइये। अगर आप यहां पर्वतारोहण , ट्रैकिंग या कैंपिंग करना चाहते हैं तो भी इसके बारे में पहले जानकारी अवश्य लें । किसी स्थानीय अनुभवी गाइड से अवश्य सलाह लें। रूद्रप्रयाग में पैदल चलने हेतु अच्छी क्वालिटी का जूता अवश्य पहनें। अगर आप रूद्रप्रयाग में एक – दो दिन रुकना चाहते हैं तो आने से पहले कोई Hotel Book अवश्य कर लीजिए।
